हिन्दू मान्यताओ के अनुसार अमरत्व प्राप्त है इन ८ चिरंजीवियों को

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सामान्यत: लोगों और वैज्ञानिक नजरिए में कहा जाता है कि धरती पर जन्मे प्राणी की एक न एक दिन मृत्यु निश्चित है। सभी महजबों के ग्रंथों और मान्यताओं में भी बताया गया है कि जिस व्यक्ति ने जन्म लिया है, उसकी मृत्यु अवश्य होगी। भगवान श्रीकृष्ण ने भगवद् गीता में भी अर्जुन को यही ज्ञान दिया था कि सिर्फ आत्मा अमर है और यह निश्चित समय के लिए अलग-अलग शरीर धारण करती है। शरीर नश्वर है, लेकिन शास्त्रों में आठ ऐसे लोग भी बताए गए हैं, जिन्होंने जन्म लिया है और वे हजारों सालों से देह धारण किए हुए हैं यानी वे अभी भी सशरीर जीवित हैं, उनकी मृत्यु होना असंभव है।

ये हर युग में अपने गुणों के आधार पर समाजिक व्यवस्था में अपनी मौजूदगी का अहसास कराते रहते हैं। उन्हें इधर-उधर तलाशने की बजाए सहज भाव से अपने समाज में या स्वयं में ही देखने की जरूरत है।

 

एक प्रचलित श्लोक के अनुसार आठ चिरंजीवी निम्नवत हैं:

 

अश्वत्थामा बलिव्र्यासो हनूमांश्च विभीषण:। कृप: परशुरामश्च सप्तएतै चिरजीविन:॥

सप्तैतान् संस्मरेन्नित्यं मार्कण्डेयमथाष्टमम्। जीवेद्वर्षशतं सोपि सर्वव्याधिविवर्जित।।




 

इस श्लोक का अर्थ यह है कि इन आठ लोगों (अश्वथामा, दैत्यराज बलि, वेद व्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य, परशुराम और मार्कण्डेय ऋषि) का स्मरण सुबह-सुबह करने से सारी बीमारियां समाप्त होती हैं और मनुष्य 100 वर्ष की आयु को प्राप्त करता है।

 

1.अश्वत्थामा :

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द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा को अमरत्व प्राप्त है. लेकिन ये अमरत्व कोई वरदान नहीं अपितु अश्वत्थामा का प्रारब्ध है. अश्वत्थामा महाभारत में कुरुक्षेत्र युद्ध लड़ने वाले योद्धाओं में से एकमात्र जीवित योद्धा है. द्रौपदी के 5 निर्दोष पुत्रों की हत्या करने पर श्री कृष्ण ने अश्वत्थामा को पाप मुक्ति के लिए ये प्रारब्ध दिया कि उसे सृष्टि के अंत तक ऐसे ही चिरंजीवी बन  भटकना पड़ेगा और ना कोई उससे बात कर सकेगा ना कोई उसे चाहेगा. उसे अपने पापों और घावों के साथ ऐसे ही तडपना होगा.  समय समय पर ऐसी ख़बरें आती है कि अश्वत्थामा को देखा गया.

 

 

2 .राजा बलि:

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बलि चिरजीवियों में से एक, पुराणप्रसिद्ध विष्णुभक्त, दानवीर, महान्‌ योद्धा, विरोचनपुत्र दैत्यराज बलि वैरोचन जिसकी राजधानी महाबलिपुर थी। इसके छलपूर्वक परास्त करने के लिए विष्णु का वामनावतार हुआ था। इसने दैत्यगुरु शुक्राचार्य की प्रेरणा से देवों को विजित कर स्वर्ग पर अधिकार कर लिया और वहाँ धर्मशासन स्थापित किया। समुद्रमंथन से प्राप्त रत्नों के लिए जब देवासुर संग्राम छिड़ा और इंद्र द्वारा वज्राहत होने पर भी बलि शुक्राचार्य के मंत्रबल से पुन: जीवित हुआ तब इसने विश्वजित्‌ और शत अश्वमेध यज्ञों का संपादन कर समस्त स्वर्ग पर अधिकार जमा लिया। कालांतर में जब यह अंतिम अश्वमेघ यज्ञ का समापन कर रहा था, तब दान के लिए वामन रूप में ब्राह्मण वेशधारी विष्णु उपस्थित हुए। शुक्राचार्य के सावधान करने पर भी बलि दान से विमुख न हुआ। वामन ने तीन पग भूमि दान में माँगी और संकल्प पूरा होते ही विशाल रूप धारण कर प्रथम दो पगों में पृथ्वी और स्वर्ग को नाप लिया। शेष दान के लिए बलि ने अपना मस्तक नपवा दिया।

लोक मान्यता है कि पार्वती द्वारा शिव पर उछाले गए सात चावल सात रंग की बालू बनकर कन्याकुमारी के पास बिखर गए। 'ओणम' के अवसर पर राजा बलि केरल में प्रतिवर्ष अपनी प्यारी प्रजा को देखने आते हैं। राजा बलि का टीला मथुरा में है।

 

 




3. महर्षि वेदव्यास:

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ऋषि वेदव्यास महाभारत ग्रंथ के रचयिता थे। वेदव्यास महाभारत के रचयिता ही नहीं, बल्कि उन घटनाओं के साक्षी भी रहे हैं, जो क्रमानुसार घटित हुई हैं। अपने आश्रम से हस्तिनापुर की समस्त गतिविधियों की सूचना उन तक तो पहुंचती थी। वे उन घटनाओं पर अपना परामर्श भी देते थे।

महर्षि व्यास ने वेद का चार भागों में विभाजन कर दिया जिससे कि कम बुद्धि एवं कम स्मरणशक्ति रखने वाले भी वेदों का अध्ययन कर सकें। व्यास जी ने उनका नाम रखा – ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। वेदों का विभाजन करने के कारण ही व्यास जी वेद व्यास के नाम से विख्यात हुये। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद को क्रमशः अपने शिष्य पैल, जैमिन, वैशम्पायन और सुमन्तुमुनि को पढ़ाया।

 

 

4. हनुमान:

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हनुमान (आञ्जनेय और मारुति भी) परमेश्वर की भक्ति (हिंदू धर्म में भगवान की भक्ति) की सबसे लोकप्रिय अवधारणाओं और भारतीय महाकाव्य रामायण में सबसे महत्वपूर्ण व्यक्तियों में प्रधान हैं। वह कुछ विचारों के अनुसार भगवान शिवजी के ११वें रुद्रावतार, सबसे बलवान और बुद्धिमान माने जाते हैं।

इन्हें बजरंगबली के रूप में जाना जाता है क्योंकि इनका शरीर एक वज्र की तरह था। हनुमान पवन-पुत्र के रूप में जाने जाते हैं| वायु अथवा पवन (हवा के देवता) ने हनुमान को पालने मे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

मारुत (संस्कृत: मरुत्) का अर्थ हवा है। नंदन का अर्थ बेटा है। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार हनुमान "मारुति" अर्थात "मरुत-नंदन" (हवा का बेटा) हैं।

रामायण के अनुसार वे जानकी के अत्यधिक प्रिय हैं। इस धरा पर जिन आठ मनीषियों को अमरत्व का वरदान प्राप्त है, उनमें बजरंगबली भी हैं। हनुमानजी का अवतार भगवान राम की सहायता के लिये हुआ। हनुमानजी के पराक्रम की असंख्य गाथाएं प्रचलित हैं। इन्होंने जिस तरह से राम के साथ सुग्रीव की मैत्री कराई और फिर वानरों की मदद से राक्षसों का मर्दन किया, वह अत्यन्त प्रसिद्ध है।

 

 

5. विभीषण:

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विभीषण रामायण के एक प्रमुख पात्र हैं। वे रावण के भाई थे।विभीषण बहुत ही बड़े राम भक्त थे। उन्होंने लंका में रहते हुए भी राम भक्ति की, जहाँ भगवान श्री राम का शत्रु रावण का राज था। राम और रावण के युद्ध के दौरान विभीषण ने सही का साथ देने का निर्णय लिया और राम की तरफ आ मिले. विभीषण ने ही राम को रावण की मृत्यु का भेद बताया था.

 

 

6. कृपाचार्य:

कृपाचार्य कौरवों और पांडवों के गुरू थे। चिरंजीवियों में वे भी एक हैं।

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कृपाचार्य महर्षि गौतम के पौत्र और शरद्वान्‌ के पुत्र थे शरद्वान की तपस्या भंग करने के लिए इंद्र ने जानपदी नामक एक देवकन्या भेजी थी, जिसके गर्भ से दो यमज भाई-बहन हुए। पिता-माता दोनों ने इन्हें जंगल में छोड़ दिया जहाँ महाराज शांतनु ने इनको देखा। इनपर कृपा करके दोनों को पाला पोसा जिससे इनके नाम कृप तथा कृपी पड़ गए। इनकी बहन कृपी का विवाह द्रोणाचार्य से हुआ और उनके पुत्र अश्वत्थामा हुए। अपने पिता के ही सदृश कृपाचार्य भी परम धनुर्धर हुए। कुरुक्षेत्र के युद्ध में ये कौरवों के साथ थे और उनके नष्ट हो जाने पर पांडवों के पास आ गए। बाद में इन्होंने परीक्षित को अस्त्रविद्या सिखाई। भागवत के अनुसार सावर्णि मनु के समय कृपाचार्य की गणना सप्तर्षियों में होती थी।

 

 

7. परशुराम:

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परशुराम त्रेता युग (रामायण काल) के एक मुनि थे। उन्हें भगवान विष्णु का छठा अवतार भी कहा जाता है। पौरोणिक वृत्तान्तों के अनुसार उनका जन्म भृगुश्रेष्ठ महर्षि जमदग्नि द्वारा सम्पन्न पुत्रेष्टि यज्ञ से प्रसन्न देवराज इन्द्र के वरदान स्वरूप पत्नी रेणुका के गर्भ से वैशाख शुक्ल तृतीया को हुआ था। वे भगवान विष्णु के आवेशावतार थे। पितामह भृगु द्वारा सम्पन्न नामकरण संस्कार के अनन्तर राम, जमदग्नि का पुत्र होने के कारण जामदग्न्य और शिवजी द्वारा प्रदत्त परशु धारण किये रहने के कारण वे परशुराम कहलाये। आरम्भिक शिक्षा महर्षि विश्वामित्र एवं ऋचीक के आश्रम में प्राप्त होने के साथ ही महर्षि ऋचीक से सारंग नामक दिव्य वैष्णव धनुष और ब्रह्मर्षि कश्यप से विधिवत अविनाशी वैष्णव मन्त्र प्राप्त हुआ। तदनन्तर कैलाश गिरिश्रृंग पर स्थित भगवान शंकर के आश्रम में विद्या प्राप्त कर विशिष्ट दिव्यास्त्र विद्युदभि नामक परशु प्राप्त किया। शिवजी से उन्हें श्रीकृष्ण का त्रैलोक्य विजय कवच, स्तवराज स्तोत्र एवं मन्त्र कल्पतरु भी प्राप्त हुए। चक्रतीर्थ में किये कठिन तप से प्रसन्न हो भगवान विष्णु ने उन्हें त्रेता में रामावतार होने पर तेजोहरण के उपरान्त कल्पान्त पर्यन्त तपस्यारत भूलोक पर रहने का वर दिया।

 

 

8. ऋषि मार्कण्डेय :

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 पिता द्वारा ठीक से भरण-पोषण न हो पाने पर, मार्कण्डेय बालवस्था में ही भगवान शिव के परम भक्त हो गए। इन्होंने शिवजी को तप कर प्रसन्न किया और महामृत्युंजय मंत्र सिद्धि की। जब यमराज इनके प्राण लेने आए तो भगवान शिव ने यम को रोक दिया, यह चिरंजीवी बन गए।

 

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